Thursday, March 30, 2017

जय माता दी
 नवरात्रि में कन्‍या पूजा का महत्व
कन्याओं को नौ देवियों के प्रतिबिंब के रूप में पूजा जाता है
नवरात्र में सप्‍तमी तिथि से कन्‍या पूजन शुरू हो जाता है और इस दौरान कन्‍याओं को घर बुलाकर उनकी आवभगत की जाती है. दुर्गाष्टमी और नवमी के दिन इन कन्याओं को नौ देवी का रूप मानकर इनका स्वागत किया जाता है. माना जाता है कि कन्याओं का देवियों की तरह आदर सत्कार और भोज कराने से मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों को सुख समृधि का वरदान देती हैं.
क्यों और कैसे किया जाता है कन्‍या पूजन?
नवरात्र पर्व के दौरान कन्या पूजन का बड़ा महत्व है. नौ कन्याओं को नौ देवियों के प्रतिबिंब के रूप में पूजने के बाद ही भक्त का नवरात्र व्रत पूरा होता है. अपने सामर्थ्य के अनुसार उन्हें भोग लगाकर दक्षिणा देने मात्र से ही मां दुर्गा प्रसन्न हो जाती हैं.
किस दिन करें कन्या पूजन
वैसे तो कई लोग सप्‍तमी से कन्‍या पूजन शुरू कर देते हैं लेकिन जो लोग पूरे नौ दिन का व्रत करते हैं वह तिथि के अनुसार नवमी और दशमी को कन्‍या पूजन करने के बाद ही प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोलते हैं. शास्‍त्रों के अनुसार कन्‍या पूजन के लिए दुर्गाष्‍टमी के दिन को सबसे ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण और शुभ माना गया है.
कन्या पूजन की विधि
- कन्‍या भोज और पूजन के लिए कन्‍याओं को एक दिन पहले ही आमंत्रित कर दिया जाता है.
- मुख्य कन्या पूजन के दिन इधर-उधर से कन्याओं को पकड़ के लाना सही नहीं होता है.
- गृह प्रवेश पर कन्याओं का पूरे परिवार के साथ पुष्प वर्षा से स्वागत करें और नव दुर्गा के सभी नौ नामों के जयकारे लगाएं.
- अब इन कन्याओं को आरामदायक और स्वच्छ जगह बिठाकर सभी के पैरों को दूध से भरे थाल या थाली में रखकर अपने हाथों से उनके पैर धोने चाहिए और पैर छूकर आशीष लेना चाहिए.
- उसके बाद माथे पर अक्षत, फूल और कुंकुम लगाना चाहिए.
- फिर मां भगवती का ध्यान करके इन देवी रूपी कन्याओं को इच्छा अनुसार भोजन कराएं.
- भोजन के बाद कन्याओं को अपने सामर्थ्‍य के अनुसार दक्षिणा, उपहार दें और उनके पुनः पैर छूकर आशीष लें.
कन्या पूजन में कितनी हो कन्याओं की उम्र?
कन्याओं की आयु दो वर्ष से ऊपर तथा 10 वर्ष तक होनी चाहिए और इनकी संख्या कम से कम 9 तो होनी ही चाहिए और एक बालक भी होना चाहिए जिसे हनुमानजी का रूप माना जाता है. जिस प्रकार मां की पूजा भैरव के बिना पूर्ण नहीं होती , उसी तरह कन्या-पूजन के समय एक बालक को भी भोजन कराना बहुत जरूरी होता है. यदि 9 से ज्यादा कन्या भोज पर आ रही है तो कोई आपत्ति नहीं है.
आयु अनुसार कन्या रूप का पूजन
- नवरात्र में सभी तिथियों को एक-एक और अष्टमी या नवमी को नौ कन्याओं की पूजा होती है.
- दो वर्ष की कन्या (कुमारी) के पूजन से दुख और दरिद्रता मां दूर करती हैं. तीन वर्ष की कन्या त्रिमूर्ति रूप में मानी जाती है. त्रिमूर्ति कन्या के पूजन से धन-धान्‍य आता है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है.
- चार वर्ष की कन्या को कल्याणी माना जाता है. इसकी पूजा से परिवार का कल्याण होता है. जबकि पांच वर्ष की कन्या रोहिणी कहलाती है. रोहिणी को पूजने से व्यक्ति रोगमुक्त हो जाता है.
- छह वर्ष की कन्या को कालिका रूप कहा गया है. कालिका रूप से विद्या, विजय, राजयोग की प्राप्ति होती है. सात वर्ष की कन्या का रूप चंडिका का है. चंडिका रूप का पूजन करने से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है.
- आठ वर्ष की कन्या शाम्‍भवी कहलाती है. इसका पूजन करने से वाद-विवाद में विजय प्राप्त होती है. नौ वर्ष की कन्या दुर्गा कहलाती है. इसका पूजन करने से शत्रुओं का नाश होता है तथा असाध्य कार्यपूर्ण होते हैं.
- दस वर्ष की कन्या सुभद्रा कहलाती है. सुभद्रा अपने भक्तों के सारे मनोरथ पूर्ण करती है.
नवरात्रों में  कन्याओं को देवी तुल्य मानकर पूजा जाता है.  शास्‍त्रों में भी लिखा है कि जिस घर में औरत का सम्‍मान किया जाता है वहां भगवान खुद वास करते हैं. कृष्णा शर्मा {ज्योतिषाचार्य )

Monday, March 27, 2017

सभी माता रानी के भक्तो को  कृष्णा शर्मा की तरफ से आपको और आपके परिवार को   नवरात्री की हार्दिक शुभकामना .
चैत्र नवरात्र शुक्ल पक्ष 28 मार्च 2017  चैत्र नवरात्र  मंगलवार से शुरु होकर 5 अप्रैल, बुधवार को रामनवमी के साथ समाप्त होगे।
प्रतिपदा व द्वितीया तिथि एक ही दिन रहेगी। मां  के भक्तों को 29 मार्च 2017 को देवी शैलपुत्री व ब्रह्मचारिणी की आराधना एक ही दिन करना होगा। प्रतिपदा तिथि का क्षय होने से नवरात्रि आठ दिनों की होगी।
घट स्थापना का शुभ मुहूर्त
इस बार घटस्थापना 8 बजकर 26 मिनट से लेकर 10 बजकर 24 मिनट तक का है। ज्योतिषाचर्या कृष्णा शर्मा जै माता दी .

Thursday, March 9, 2017

 होली का महूर्त  -
ज्योतिष के अनुसार होलिका दहन  पूजन भद्रा के मुख को त्याग करके करना ही शुभ  होता है। फाल्गुन मास 12 मार्च को पूर्णिमा उदय व्यापिनी है। इसी पूर्णिमा को प्रदोष काल में होलिका दहन करने का विधान शुभ माना गया है। वहीं इस दिन भद्रा का मुख सांय 5 बजकर 35 मिनट से 7 बजकर 33 मिनट तक है। इसी कारण इस साल होलिका दहन शाम  6 बजकर 30 मिनट से 8 बजकर 35 मिनट तक किया  जा सकता है।
पूजन विधि -पूजा करते वक्त पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठना चाहिए। फिर  माला, रोली, , फूल , कच्चा सूत, गुड़, साबुत हल्दी, बताशे,गुजिया , गुलाल, नारियल, पॉच प्रकार के अनाज में गेंहूॅ की बालियॉ और साथ में एक लोटा जल लेकर  होलिका के चारों ओर सात  बार परिक्रमा कच्चे सूत को होलिका के चारों ओर  लपेटना चाहिए।  जल से अर्घ्य दे। फिर  होलिका में अग्नि प्रज्ज्वलित करने से पहले होलिका में लगे हुए डंडे को बाहर निकाल दे ।होलिका दहन के बाद  होली की  राख को घर के चारों ओर और दरवाजे पर छिड़क देना  चाहिए।  ताकि आपके घर में  घर में सुख-समृद्धि बनी रहे और साथ ही  नकारात्मक शक्तियों  का प्रवेश  भी नहीं हो सके ।
 इसी के साथ आप सभी को और आपके परिवार को होली की मंगल कामना की हार्दिक बधाई ,शुभ होली। ,हर हर महादेव। ज्योतिषाचार्य कृष्णा शर्मा।