''या देवी सर्वभूतेषु मां बह्मचारिणी रूपेण संस्थिता ,नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
शक्ति के दूसरे स्वरुप माँ ब्रह्मचारणी की पूजा से मिलेगा सौभाग्य,ज्ञान और बल का वरदान। दूर होगा आलस्य, अंहकार, लोभ, असत्य।
मां दुर्गा का दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी को सभी विधाओं का ज्ञाता माना जाता है। मां के इस रूप की आराधना से मनचाहे फल की प्राप्ति होती है। तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार व संयम जैसे गुणों की वृद्धि होती है।
ब्रहमचारिणी मां दुर्गा स्वेत वस्त्र पहने दाएं हाथ में अष्टदल की माला और बांए हाथ में कमण्डल लिए हुए सुशोभित है। पैराणिक ग्रंथों के अनुसार नराद मुनि के उपदेश के बाद माँ ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तप किया। जिस कारण इनका नाम ब्रह्मचारिणी पड़ा। 1000 वर्षों तक सिर्फ फल खाकर ही रहीं तथा अगले 3000 वर्ष की तपस्या सिर्फ पेड़ों से गिरी पत्तियां खाकर की। इसी कड़ी तपस्या के कारण उन्हें ब्रह्मचारिणी व तपस्चारिणी कहा गया है। कठोर तप के बाद इनका विवाह भगवान शिव से हुआ।
उपाय -
महादेव की पूजा के बगैर देवी की कृपा नहीं मिलती है. इस लिए प्रथम महादेव की पूजा फिर माँ की पूजा करे।माता को दूध गगाजल से स्नान कराये वस्त्र ,माला, सिन्दूर अर्पित करके चीनी का भोग लगाए और शिव पार्वती जी को सात बार गठबंधन में बांधे। चन्दन का इत्र मेहँदी अर्पित करे।रुद्राक्ष की माला पर मंत्रो का जाप करे।और सबसे अंत में ब्रह्मा जी के नाम से जल, फूल, अक्षत, सहित सभी सामग्री हाथ में लेकर “ॐ ब्रह्मणे नम:” कहते हुए सामग्री भूमि पर रखें और दोनों हाथ जोड़कर सभी देवी देवताओं को प्रणाम करें.
इस दिन साधक स्वाधिष्ठान चक्र (Swadhisthan Chakra) में मन को स्थापित करता हैऔर व्यक्ति की कुण्डलनी शक्ति जागृत हो जाती है.
ध्यान मंत्र;
1)शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।
शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणीप्रणमाम्यहम्।
2)ॐ भगवती ब्रह्मचारणी नमो स्वाहा!
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